Wednesday, June 5, 2013

सरहाने मीर के आहिस्ता बोलो

1782 : मीर मुहम्मद तक़ी दिल्ली छोड़ कर नवाब आसफुददौला की दावत पर लखनऊ आ तो गया। मगर न उसको यह शहर रास आया, न अवध दरबार। दरबार छूटा, फिर सेहत ने भी साथ छोड़ दिया। बेटी, बेटा और उन के बाद बीवी ने भी उसको छोड़ ख़ुदा का दामन थाम लिया।

1810 : 21 सितंबर, जुमे के दिन आख़िरकार मीर ने भी इस दुनिया-ए फ़ानी को अलविदा कहा और शहर के बाहर एक क़ब्रिस्तान में हमेशा हमेशा के लिये सुकूनत इख्तियार कर ली। मगर लखनऊ में किसी को काहे का सुकून। जल्दी ही हथौड़ों के शोर ने उसकी रूह को हिला दिया। उसकी क़ब्र के ऊपर लोहे ही पटरियाँ बिछाईं जा रही थीं।

1867 : 23 अप्रैल; लखनऊ को कानपुर से जोड़ने वाली (47 मील) इस रेलवे लाइन को पब्लिक के लिये खोल दिया गया। उस वक़्त यह अवध रोहेलखण्ड रेलवे का हिस्सा थी, जो 1925 में ईस्ट इंडियन रेलवे में शामिल कर ली गई। 1867 तक यह जगह हर तरफ़ बाग़ों से घिरी हुई थी। अब भी यहाँ बना रेलवे स्टेशन चारबाग़ के नाम से ही जाना जाता है।

1914 : 21 मार्च को उस इमारत की नीव रखी गई और बारह साल लगे उसे पूरा होने में जिसको आज हम रेलवे स्टेशन की शक्ल में देखते हैं। दुनिया में कम ही रेलवे स्टेशन इतने ख़ूबसूरत होंगे, जैसा कि हमारा चारबाग़ है। आसमान से देखने पर इसकी मीनारें ऐसी दिखती हैं जैसे शतरंज की बिसात पर मोहरे बिखरे हों।

1926 से आज तक शायद ही कोई ऐसा हो जिसने इस इमारत को देखा हो और इसकी शान-ओ शौकत से मुतासिर न हुआ हो। मगर क्या कभी किसी ने ट्रेनों की आवा-जाई और दुनिया के शोर शराबों में दब चुकी इस इमारत की आवाज़ को सुनने की कोशिश की है, जिसकी आगोश में हिंदुस्तान का अज़ीम शायर सो रहा है –

सरहाने मीर के आहिस्ता बोलो     |      अभी टुक रोते-रोते सो गया है     - मीर तक़ी मीर

Charbagh Railway Station, Lucknow
image taken on May 09, 2013
Nikon Coolpix L26

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References:
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Charbagh Railway Station, Lucknow
image taken on May 09, 2013
Nikon Coolpix L26

سرهانے میر کے آہستہ بولو 

 1782 : میر محمد تقی دہلی چھوڑ کر نواب آصف الدولہ کی دعوت پر لکھنؤ آ تو گیا. مگر نہ اس کو یہ شہر راس آیا، نہ اودھ دربار. دربار چھوٹا، پھر صحت نے بھی ساتھ چھوڑ دیا. بیٹی، بیٹا اور ان کے بعد بیوی نے بھی اس کو چھوڑ خدا کا دامن تھام لیا.

21 : 1810 ستمبر، جمعہ کے دن بالآخر میر نے بھی اس دنیاء فاني کو الوداع کہا اور شہر کے باہر ایک قبرستان میں ہمیشہ ہمیشہ کے لئے سكونت اختیار کر لی. مگر لکھنؤ میں کسی کو کاہے کا سکون. جلد ہی ہتھوڑے کے شور نے اس کی روح کو ہلا دیا. اس کی قبر کے اوپر لوہے ہی پٹرياں بچھائی جا رہی تھیں.

1867 : 23 اپریل؛ لکھنؤ کو کانپور سے جوڑنے کرنے والی (47 میل) اس ریلوے لائن کو پبلک کے لیے کھول دیا گیا. اس وقت یہ اودھ روهیلكھنڈ ریلوے کا حصہ تھی جو 1925 میں ایسٹ انڈین ریلوے میں شامل کر لی گئی. 1867 تک یہ جگہ ہر طرف باغوں سے گھری ہوئی تھی. اب بھی یہاں بنا ریلوے اسٹیشن چارباغ کے نام سے ہی جانا جاتا ہے.

1914 : 21 مارچ کو اس عمارت کی بنیاد رکھی گئی اور بارہ سال لگے اسے مکمل ہونے میں جس کو آج ہم ریلوے اسٹیشن کی شکل میں دیکھتے ہیں. دنیا میں کم ہی ریلوے اسٹیشن اتنے خوبصورت ہوں گے، جیسا کہ ہمارا چارباغ ہے. آسمان سے دیکھنے پر اس کی ميناریں ایسی نظر آتی ہیں جیسے شطرنج کی بساط پر مہرے بکھرے ہوں.

1926 سے آج تک شاید ہی کوئی ایسا ہو جس نے اس عمارت کو دیکھا ہو اور اس کی شان و شوکت سے متاثر نہ ہوا ہو. مگر کیا کبھی کسی نے ٹرینوں کی آوا جائی اور دنیا کے شور شرابوں میں دب چکی اس عمارت کی آواز کو سننے کی کوشش کی ہے، جس کی آغوش میں ہندوستان کا عظیم شاعر سو رہا ہے -

Mir Mohammad Taqi Mir

Thursday, January 10, 2013

साग़र ख़य्यामी / ساغر خيامي

जाड़े

ऐसी सर्दी न पड़ी ऐसे न जाड़े देखे
दो बजे दिन को अज़ाँ देते थे मुर्ग़ सारे
वो घटा टोप नज़र आते थे दिन को तारे
सर्द लहरों से जमे जाते थे मय के प्याले
एक शायर ने कहा चीख़ के साग़र भाई
उम्र में पहले पहल चमचे से चाय खाई।

आग छूने से भी हाथों में नमी लगती थी
सात कपड़ों में भी कपड़ों की कमी लगती थी
वक़्त के पांव की रफ़्तार थमी लगती थी
रास्ते में कोई बारात, जमी लगती थी
जम गया पुश्त पे घोड़े की बेचारा दूल्हा
खोद के खुरपी से साले ने उतारा दूल्हा।

कड़कड़ाते हुए जाड़े की क़यामत तौबा
आठ दिन कर न सके लोग हज़ामत तौबा
सर्द था उन दिनों बाज़ार-ए मुहब्बत तौबा
कर के बैठे थे शरीफ़न से शराफ़त तौबा
वो तो ज़हमत भी क़दमचों की न सर लेते थे
जो भी करना था बिछौने पे ही कर लेते थे।

सर्द गर्मी का भी मज़मून हुआ जाता था
जम के टॉनिक भी तो माजून हुआ जाता था
जिस्म लर्ज़े के सबब नून हुआ जाता था
ख़ासा शायर भी तो मजनून हुआ जाता था
कपकपाते हुये होटों से ग़ज़ल गाता था
पक्के रागों का वो उस्ताद नज़र आता था।

और भी सर्द हैं, माबूद ये एहसास न था
कब से आये नहीं महमूद यह एहसास न था
क़ुल्फ़ा खाते हैं कि अमरूद ये एहसास न था
नाक चेहरे पे है मौजूद ये एहसास न था
मुंह पे रूमाल रखे बज़्म से क्या आये थे
ऐसा लगता था वहाँ नाक कटा आये थे।

सख़्त सर्दी के सबब रंग था महफ़िल का अजीब
एक कम्बल में घुसे बैठे थे दस बीस ग़रीब
सर्द मौसम ने किया पंडितो मुल्ला को क़रीब
कड़कड़ाते हुए जाड़े वो सुख़न की तक़रीब
दरमियाँ शायरो सामे के थमे जाते थे
इतनी सर्दी थी कि अशआर जमे जाते थे॥


 जब भी कड़ाके की ठंड पड़ती है, तो मुझे साग़र ख़य्यामी (रशीदुल हसन नक़वी) की नज़्म ‘जाड़े’ से बेहतर कुछ नज़र नहीं आता। शायरी साग़र ख़य्यामी के ख़ून में शामिल थी। साग़र ख़य्यामी के बाप दादा भी लखनऊ के बेहतरीन शायरों में गिने जाते थे। 1997 में उन्हें ग़ालिब एवार्ड से नवाज़ा गया था।

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جاڑے


ایسی سردی نہ پڑی ایسے نہ جاڑے دیکھے
دو بجے دن کو اذاں دیتے تھے مرغ سارے
وہ گھٹا ٹوپ نظر آتے تھے دن کو تارے
سرد لہروں سے جمے جاتے تھے مے کے پیالے
ایک شاعر نے کہا چیخ کے ساغر بھائی
عمر میں پہلے پہل چمچے سے چائے کھائی.

آگ چھونے سے بھی ہاتھوں میں نمی لگتی تھی
سات کپڑوں میں بھی کپڑوں کی کمی لگتی تھی
وقت کے پاؤں کی رفتار تھمی لگتی تھی
راستے میں کوئی بارات، جمی لگتی تھی
جم گیا پشت پھ گھوڑے کی بیچارا دولہا
کھود کے كھرپي سے سالے نے اتارا دولہا.

كڑكڑاتے ہوئے جاڑوں کی قیامت توبہ
آٹھ دن کر نہ سکے لوگ حجامت توبہ
سرد تھا ان دنوں بازار محبت توبہ
کرکے بیٹھے تھے شريفاً سے شرافت توبہ
وہ تو زحمت بھی قدمچوں کی نہ سر لیتے تھے
جو بھی کرنا تھا بچھونے پہ ہی کر لیتے تھے.

سرد گرمی کا بھی مضمون ہوا جاتا تھا
جم کے ٹانک بھی تو معجون ہوا جاتا تھا
جسم لرزے کے سبب نون ہوا جاتا تھا
خاصہ شاعر بھی تو مجنون ہوا جاتا تھا
كپكپاتے ہوئے ہونٹوں سے غزل گاتا تھا
پکے راگوں کا وہ استاد نظر آتا تھا.

اور بھی سرد ہیں، معبود یہ احساس نہ تھا
کب سے آئے نہیں محمود یہ احساس نہ تھا
قلفا کھاتے ہیں کہ امرود یہ احساس نہ تھا
ناک چہرے پہ ہے موجود یہ احساس نہ تھا
منہ پہ رومال رکھے بذم سے کیا آئے تھے
ایسا لگتا تھا وہاں ناک کٹا آئے تھے.

سخت سردی کے سبب رنگ تھا محفل کا عجیب
ایک کمبل میں گھسے بیٹھے تھے دس بیس غریب
سرد موسم نے کیا پنڈت و ملا کو قریب
كڑكڑاتے ہوئے جاڑے وہ سخن کی تقريب
درمياں شاعر و سامع کے تھمے جاتے تھے
اتنی سردی تھی کہ اشعار جمے جاتے تھے
ساغر خيامي

Monday, November 26, 2012

लखना का लखनऊ और बावन मछलियाँ



अब मछ्छी भवन का नाम मछ्छी भवन क्यों पड़ा? मुझे क्या पता भला। अरे क़िला था, उसपर मलियाँ बनीं थीं। तो मछ्छी भवन। और क्या? मगर वह तो कहते हैं कि बावन (52) मछलियाँ बनीं थीं, इस लिए नाम मछ्छी बावन था, न कि मछ्छी भवन। लोगों ने नाम बिगाड़ दिया। तो मैं क्या करूँ?

1590 में मुग़ल बादशाह अकबर ने जब मुल्क को बारह सूबों में बांटा तो अवध का सूबा शेख़ अब्दुर्रहीम साहब को थमा दिया। शेख़ साहब थे तो बिजनौर के, आ पहुंचे हमारे शहर और शाह पीर मुहम्मद टीले (अरे वही अपना लक्ष्मण टीला) पर अपना पञ्च महल खड़ा कर लिया। उसके बाद टीले के पास एक छोटा सा, मगर मज़बूत क़िला बनाया गया जिसके एक मकान में छब्बीस (26) महराबें थीं। हर महराब पर दो मछलियाँ बनी थीं। यानि कि कुल बावन।

शेख़ साहब और उनके इस क़िले का नाम ऐसा बुलंद हुआ, कि लोग बताते नहीं थकते थे
अरे, कल को तो मैं उधर गया था.
अरे! कहाँ?’
अरे वहीं, जहां हैं मछ्छी बावन.
अरे वहाँ! हमें भी ले लेते भई. हम भी देख आते.
हाँ भाई, क्या शान है. वहाँ की तो बात ही निराली है.....

1910 के आस पास किंग जार्ज नाम का छोटा सा मेडिकल कालेज सारी मछलियाँ खा गया। मछलियों का बस नाम रह गया। और जिन हाथों ने वह मछलियाँ बनाईं थीं, वह क़िला बनाया था; और उस क़िले के आस पास जो बस्ती बसनी शुरू हुई थी, उसकी बहुत सी इमारतें, उन हाथों का क्या? जिस आर्किटेक्ट ने पहली बार उस शहर का ख़ाका खींचा, जो बाद में लखनऊ कहलाया; जब तक लखनऊ का नाम ज़िंदा रहेगा, उसका नाम ज़िंदा रहेगा लखना।

बिना लखना बोले लखनऊ कहिए तो ज़रा.... कोशिश तो कीजिये जनाब॥
Gulistan-e Lucknow
Machchi Bawan in 1858

اب مچھي بھون کا نام مچھي بھون کیوں پڑا؟ مجھے کیا پتہ بھلا. ارے قلعہ تھا، اس پر مچھلیاں بنیں تھیں. تو مچھي بھون. اور کیا؟ مگر وہ تو کہتے ہیں کہ باون (52) مچھلیاں بنیں تھیں، اس لئے نام مچھي باون تھا، نہ کہ مچھي بھون. لوگوں نے نام بگاڑ دیا. تو میں کیا کروں؟

 1590 میں مغل بادشاہ اکبر نے جب ہند کو بارہ صوبوں میں بانٹا تو اودھ کا صوبہ شیخ عبدالرحیم صاحب کو تھما دیا. شیخ صاحب تھے تو بجنور کے، آ پہنچے ہمارے شہر اور شاہ پیر محمد ٹیلے (ارے وہی اپنا لکشمن ٹيلا) پر اپنا پنچ محل کھڑا کر لیا. اس کے بعد ٹیلے کے پاس ایک چھوٹا سا، مگر مضبوط قلعہ بنایا گیا جس کے ایک مکان میں چھبیس (26) محرابیں تھیں. ہر محراب پر دو مچھلیاں بنی تھیں. یعنی کہ کُل باون.

 شیخ صاحب اور ان کے اس قلعہ کا نام ایسا بلند ہوا، کہ لوگ بتاتے نہیں تھكتے تھے -

'ارے، کل کو تو میں اُدھر گیا تھا.'
'ارے! کہاں؟'
'ارے وہیں، جہاں ہیں مچھي باون.'
"ارے وہاں! ہمیں بھی لے لیتے بھئی. ہم بھی دیکھ آتے.'
"ہاں بھائی، کیا شان ہے. وہاں کی تو بات ہی نرالے ہے...'

 1910 کے آس پاس کنگ جارج نام کا چھوٹا سا میڈیکل کالج ساری مچھلیاں کھا گیا. مچھلیوں کا بس نام رہ گیا. اور جن ہاتھوں نے وہ مچھلیاں بنائیں تھیں، وہ قلعہ بنایا تھا؛ اور اس قلعہ کے آس پاس جو بستی بسني شروع ہوئی تھی، اس کی بہت سی عمارتیں، ان ہاتھوں کا کیا؟ جس اركیٹكٹ نے پہلی بار اس شہر کا خاكہ کھینچا، جو بعد میں لکھنؤ کہلایا؛ جب تک لکھنؤ کا نام زندہ رہے گا، اس کا نام زندہ رہے گا - لکھنا.

بغیر لکھنا بولے لکھنؤ کہیے تو ذرا .... کوشش تو کیجئے جناب.

Monday, November 12, 2012

सहर लखनवी

यह शहर मुहब्बत का बाज़ार है
यहाँ जो है जी का ख़रीदार है
मुअत्तर है हर एक इस की गली
खिलाते हैं गुल पाएंचे की कली

इसी शहर का नाम है लखनऊ
इसी शहर की सहर है गुफ़्तगू
अजब शहर है कुछ अजब लोग हैं
बहुत हैं मगर मुन्तख़ब लोग हैं


मुअत्तर : महकती हुई (अत्र/इत्र में डूबी); मुन्तख़ब : ख़ास, चुने हुए

Gulistan-e Lucknow
Shahar-e Lucknow
 
یہ شہر محبّت کا بازار ہے
یہاں جو ہے جی کا خریدار ہے
معطر ہے ہر ایک اس کی گلی
کھلاتے ہیں گل پائنچے کی کلی
 
اسی شہر کا نام ہے لکھنؤ
اسی شہر کی سحر ہے گفتگو
عجب شہر ہے کچھ عجب لوگ ہیں
بہت ہیں مگر منتخب لوگ ہیں

 سحر لکھنوی

Friday, September 7, 2012

अजूबा-ए लखनऊ : दोहरिया कबूतर

पता नहीं यह बात कितनी सही है, कितनी ग़लत; सच है या झूठ; मगर लखनऊ की तारीख़ में इसका ज़िक्र मिलता है। यहाँ तक कि शरर लखनवी ने भी इस बारे में लिखा है। लखनऊ की कबूतरबाज़ी, बटेरबाज़ी, मुर्ग़बाज़ी के बारे में आप सब जानते ही हैं। मैं भी लिख चुका हूँ। मगर लखनऊ की हर बात में कोई अजूबा न जुड़ा हो, यह तो हो नहीं सकता न।

नवाब नसीरुद्दीन हैदर के ज़माने में थे कोई कबूतरों के माहिर। क्या किया कि दो कबूतर के बच्चे लिये। एक का दायाँ बाज़ू काटा, दूसरे का बायाँ, और जोड़ दिया आपस में। दोनों बाज़ुओं को आपस में जोड़ कर टाँके लगाये, पाला पोसा, बड़ा किया और उड़ा दिया। ये कहलाये ‘दोहरिया कबूतर’। नवाब साहब जब गोमती के एक किनारे पर बैठे आराम फरमा रहे होते थे तो ये साहब दूसरे किनारे से इन कबूतरों को उड़ा दिया करते थे। कबूतर अक्सर जाकर नवाब साहब के पास बैठ जाया करते थे और वह खुश होकर इनाम लुटाया करते थे।


तस्वीर (ज़ाहिर सी बात है) ख़्याली है

عجوبۂ لکھنؤ : دوہريا کبوتر

معلوم نہیں یہ بات کتنی صحیح ہے، کتنی غلط؛ سچ ہے یا جھوٹ؛ مگر لکھنؤ کی تاریخ میں اس کا ذکر ملتا ہے. یہاں تک کہ شرر لکھنوی نے بھی اس بارے میں لکھا ہے. لکھنؤ کی كبوتربازي، بٹیربازي، مرغ بازي کے بارے میں آپ سب جانتے ہی ہیں. میں بھی لکھ چکا ہوں. مگر لکھنؤ کی ہر بات میں کوئی عجوبہ نہ جڑا ہو، یہ تو ہو نہیں سکتا نہ.

نواب نصیرالدین حیدر کے زمانے میں تھے کوئی کبوتروں کے ماہر. کیا کیا، کہ دو کبوتر کے بچے لیے. ایک کا داہنا بازو کاٹا، دوسرے کا بایاں، اور جوڑ دیا آپس میں. دونوں بازو کو آپس میں جوڑ کر ٹانکے لگائے، پالا پوسا، بڑا کیا اور اڑا دیا. یہ كہلاۓ 'دوہريا کبوتر'. نواب صاحب جب گومتی کے ایک کنارے پر بیٹھے آرام فرما رہے ہوتے تھے تو یہ صاحب دوسرے کنارے سے ان کبوتروں کو اڑا دیا کرتے تھے. کبوتر اکثر جا کر نواب صاحب کے پاس بیٹھ جایا کرتے تھے اور وہ خوش ہو کر انعام لٹايا کرتے تھے.

Sunday, July 29, 2012

आबदारख़ाना-ए लखनऊ


आबदारख़ाना – नाम सुना है कभी??? मुश्किल से ही कोई हाँ कहेगा। आज तो हमें बावर्चीख़ाना तक सुनाई नहीं पड़ता जो कि घर घर की बात है। हर जगह किचन हो गया है। तो आबदारख़ाना क्या सुनाई पड़ेगा जो नवाबों और अमीरों की बात थी।

आबदारख़ाना, यानि कि पीने के पानी का इंतेज़ाम या उसको रखने की जगह। बाक़ाएदा इसके दारोग़ा होते थे, यानि कि इनचार्ज और उनके नीचे मुलाज़िमों की फौज। पानी कोरे घड़ों में भर कर रखा जाता। पीने के लिये ख़ूबसूरत आबख़ोरे (अरे कुल्हड़ मत कहिये जनाब। आबख़ोरा में जो नवाबी झलकती है वह लफ़्ज़ कुल्हड़ में कहाँ) रखे जाते। घड़ों पर लाल रंग का कपड़ा चढ़ा दिया जाता था और उसे हमेशा पानी से तर रखा जाता था। हवा जितनी गरम होती थी, घड़े का पानी उतना ही ठंडा होता था। यह तरीक़ा हम अब भी प्याऊ पर देखते हैं।

सुराहियाँ लखनऊ की मिट्टी से हमेशा बेहतरीन बनी हैं, या झज्झर, जिनके मुंह पर कपड़ा बांध कर पेड़ों की डालियों पर उल्टा लटका देते थे। बरसात के मौसम में यह सब काम न आता, तो घड़ों को रस्सी से बांध कर कुएं के पानी में डुबा कर रखते थे। वक़्त के साथ नवाबी ख़त्म हो गई, नवाब नहीं रहे। आबदारख़ाने भी नहीं रहे।


آب دار خانۂ لکھنؤ

آب دار خانہ - نام سنا ہے کبھی؟؟؟ مشکل سے ہی کوئی ہاں کہے گا. آج تو ہمیں باورچي خانہ تک سنائی نہیں پڑتا جو کہ گھر گھر کی بات ہے. ہر جگہ کِچن ہو گیا ہے. آب دار خانہ کیا سنائی پڑے گا جو نوابوں اور امیروں کی بات تھی.

آب دار خانہ، یعنی کہ پینے کے پانی کا انتظام یا اس کو رکھنے کی جگہ. باقائدہ اس داروغہ ہوتے تھے، یعنی کہ اِنچارج اور ان کے نیچے ملازموں کی فوج. پانی كورے گھڑوں میں بھر کر رکھا جاتا. پینے کے لیے خوبصورت آب خورے (ارے کلہڑ مت کہیے جناب. آب خورہ میں جو نوابی جھلکتی ہے وہ لفظ کلہڑ میں کہاں) رکھے جاتے. گھڑوں پر سرخ رنگ کا کپڑا چڑھا دیا جاتا تھا اور اسے ہمیشہ پانی سے تر رکھا جاتا تھا. ہوا جتنی گرم ہوتی تھی، گھڑے کا پانی اتنا ہی ٹھنڈا ہوتا تھا. یہ طریقہ ہم اب بھی پياؤ ​​پر دیکھتے ہیں.

سراهياں لکھنؤ کی مٹی سے ہمیشہ ہی بہترین بنی ہیں، یا جھجھر، جن کے منہ پر کپڑا باندھ کر درختوں کی شاخوں پر الٹا لٹکا دیتے تھے. بارش کے موسم میں یہ سب کام نہ آتا، تو گھڑوں کو رسی سے باندھ کر کنویں کے پانی میں ڈبو کر رکھتے تھے. وقت کے ساتھ نوابی ختم ہو گئی. نواب نہیں رہے. آب دار خانے بھی نہیں رہے.


Wednesday, June 13, 2012

आम क्या हैं ख़ुदा की कुदरत हैं; जिन से हिंदोस्तान जन्नत है

दुनिया में कहीं भी अगर आम का नाम लिया जाता है तो भारत का नाम उसके साथ जुड़ ही जाता है। आम का नाम भारत में बहुत ही आम है। और ऐसे ही आम हैं यहाँ आम को चाहने वाले –
हिन्द के सब मेवों का सरदार है | रौनक़ हर कूचा ओ बाज़ार है (इसमाईल मेरठी)

आम को चाहने वाले भारत के हर कोने में मौजूद हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब का आम खाने का क़िस्सा तो दुनिया जानती है। ऐसे ही यहाँ लखनऊ में भी थे कोई अब्दुल बाक़ी साहब। आम ऐसे पसंद आये कि पूरी मसनवी (बहुत लंबी कविता) लिख मारी। कुल बीस पेज की यह मसनवी ‘अम्बा नामा’ 1922 में लखनऊ से छप भी चुकी है। ज़ाएक़े के लिये कुछ शेर देखिये –

मग़्ज़ बादाम से है बेहतर आम | जिस का बे दाम बंदा है बादाम।
तुख़्म शीर ओ शकर में पलता है | बन के तब शहद फल निकलता है।
जब कि ये झूलते हैं शाख़ों पर | हूरें गाती हैं अपने काख़ों पर।
अब्र मस्ताना वार झूमता है | शौक़ से मुंह को उनके चूमता है।
...    ...
आम क्या हैं ख़ुदा की कुदरत हैं | जिन से हिंदोस्तान जन्नत है॥
{मग़्ज़: गूदा; तुख़्म: बीज; काख़: बारामदा या गैलरी; अब्र: बादल}
Lucknow : the City of Mangoes

Saturday, May 26, 2012

मिटे नामियों के निशां कैसे कैसे – ख़्वाजा आतिश

आज लखनऊ में मैं नौजवानों की किसी महफ़िल में अगर आतिश का नाम लूं तो शायद बहुत कम ही लोग इसे समझ पाएंगे। मगर पूरी दुनिया में कहीं भी उर्दू (या हिन्दी भी) जानने वालों की महफ़िल में मैं उनका एक शेर पढ़ दूं तो शायद हर एक ने सुना होगा –
ज़मीन-ए चमन गुल खिलाती है क्या क्या : बदलता है रंग आसमां कैसे कैसे ॥

ख़्वाजा हैदर अली आतिश थे तो दिल्ली के किसी सूफ़ी ख़ानदान के, मगर उनके वालिद ख़्वाजा अली बख़्श फैज़ाबाद आकार बस गए थे। वहीं 1778 में आतिश का जन्म हुआ। कमउमरी में ही बाप का साया सर से उठ गया। सो पढ़ाई ठीक से न हो सकी। मगर तलवारबाज़ी में कोई जवाब न था। बड़े होकर नवाब मिर्ज़ा मुहम्मद तक़ी के तलवारबाज़ों में शामिल हो गये। फिर उन्हीं के साथ लखनऊ चले आये।

लखनऊ की तो फ़िज़ा में ही शाएरी थी, और मिज़ाज ख़ानदानी सूफ़ियाना। मूसहफ़ी जैसे उस्ताद का साथ मिल गया तो शायरी ऐसी परवान चढ़ी कि सर चढ़ कर बोलने लगी। नवाब मुहम्मद तक़ी की मौत के बाद किसी और से जुड़ने से इंकार कर दिया। पूरी तरह दरवेशी इख़्तियार कर ली। लिबास गेरुए रंग का चोग़ा। हाथ में मोटा डांडा। मगर कमर से तलवार न छूटी। बाद में भांग भी पीनी शुरू कर दी और पूरी तरह अपनी ही दुनिया में रंग गये।
 
शाह-ए लखनऊ से अस्सी रुपये महीने के मिलते थे। उसी में गुज़र होती थी। नावाज़गंज के क़रीब माधोलाल की चढ़ाई के पास एक छोटा सा बाग़ीचा जिसमें एक कच्चा मकान भी था, ख़रीद लिया था। शादी भी की और एक बेटा भी हुआ। आख़िर उम्र में आँखों की बीनाई जाती रही थी। 1847 में इन्तेक़ाल के वक़्त काफ़ी बीमार और कमज़ोर हो गये थे। उनके घर में ही उनको दफन किया गया।
Khwaja Haidar Ali Atish
आये भी लोग बैठे भी उठ भी खड़े हुये
मैं जा ही ढूंढता तेरी महफ़िल में रह गया

Tuesday, May 15, 2012

लखनऊ में खाईये तो बालाई...

लखनऊ वालों को बालाई का शौक़ शुरू से ही रहा है. बालाई की तहों को इतनी खूबसूरती से जमाना शायद ही किसी और शहर के लोगों को आता हो. दरअसल इसको पुराने ज़माने से मलाई ही कहा जाता रहा है. नवाब आसिफुद्दौला बहादुर को यह इस क़दर पसंद थी कि वह इसको ख़ास तरीकों से तैयार करवाया करते थे. उन्हों ने इसका नाम मलाई से बालाई कर दिया क्योंकि यह दूध के ऊपर तैरती है = बाला + मलाई. फिर तो यह लफ्ज़ इस क़दर ज़बान चढ़ा कि हर शहर में फैल गया और बालाई बोलना शरीफ़ाना ज़बान का हिस्सा बन गया. तो अगली बार अगर आप लखनऊ में हैं, और अपने आप को शरीफ़ समझते हैं, और बालाई की जगह मलाई पर हाथ साफ़ कर रहे हैं..... तो या तो मलाई को दुरुस्त कर लीजिएगा, या शरीफ़ को.

Thursday, April 19, 2012

जिसको दे न मौला.......

कहते हैं पुराने लखनऊ में कुछ दूकानदार अब भी आसफ़-उद-दौला का नाम लेकर दूकानें खोलते हैं. आसफ़-उद-दौला 23 सितम्बर, 1748 को पैदा हुए, 26 जनवरी, 1775 को उन्हें अवध के नवाब वज़ीर के ओहदे से नवाज़ा गया, और 28 जनवरी 1775 को अपने पिता शुजा-उद-दौला की मृत्यु के बाद 26 साल की उम्र में नवाब बने. आज जिस लखनऊ पर आप फख़्र करते हैं, यह लखनऊ लखनऊ होता ही नहीं अगर आसफ़-उद-दौला 1775 में अवध की राजधानी को फैजाबाद से लखनऊ न ले आते. 21 सितम्बर 1797 को उन्होंने हमेशा के लिये ख़ामोशी इख़्तियार कर ली और इमामबाड़ा आसफ़ी में आरामफ़र्मा हैं.

1783 के एक दशक तक चले अकाल के वक़्त जिसमें सब कुछ बर्बाद हो चुका था, आसफ़-उद-दौला ने आसफ़ी (बड़ा) इमामबाड़ा बनवाना (1784) शुरू ही इस लिये किया था कि लोगों को हक़ का रोज़गार मिल जाये और वह सिर्फ उनके रहम पर न रहें. कहा जाता है दिन भर दीवारें खड़ी होती थीं और रात में गिरा दी जाती थीं. और इमारत सालों साल तक तक पूरी न हुई जब तक अकाल चलता रहा.

सदियों से यह सदा लखनऊ की गलियों में गूंजती आ रही है, और ताक़यामत गूंजती रहेगी –

जिसको दे न मौला, उसके दे आसफ़-उद-दौला.’

Nawab Asaf ud Daula


Monday, March 12, 2012

शीरमाल-ए अवध

मुसलमान जब भारत आये तो अपने साथ ख़मीरी और तंदूरी रोटियाँ लाये। ये सादी रोटियाँ थीं, इन पर घी तक न लगता था। भारत आकर उन्होंने जिन अजीब चीज़ों को पहली बार देखा, उनमें पूरियाँ भी थीं। पहले तो उन्होंने अपनी रोटियों पर घी चपोड़ा, फिर उनमें परतें और तहें जमानी शुरू करदीं। इस तरह पराठे बने। शाही दस्तरख़ान तक पहुँचते पहुँचते ये पराठे बाकरख़ानी बन गये।

हमारे नवाब, बादशाह-ए अवध नसीरुद्दीन हैदर के ज़माने में मुहम्दू नाम के एक शख़्स, जो यहाँ का तो नहीं था कहीं बाहर से आया था, ने फिरंगी महल में एक खाने का होटल खोला। जल्द ही उसकी नहारी की शोहरत दूर दूर तक फैल गई। यहाँ तक कि लखनऊ के बड़े बड़े रईस और शहज़ादे भी उसके ज़ाएक़े की क़दर करने लगे। मुहम्दू ने नहारी के साथ खाने के लिए रोटियों के साथ भी तजुर्बे किये। उन तजुर्बों का बेहतरीन नतीजा शीरमाल की शक्ल में सामने आया।

Sheermal - e Awadh


आज कोई 180 साल बाद भी शीरमाल अवध से बाहर कहीं नहीं बनती। अगर बनती भी है हम से बेहतर नहीं। अब वक़्त है, कि अब तक नहीं, तो अब हमें शीरमाल को अवध की क़ौमी रोटी डिक्लेयर कर देनी चाहिये।

Monday, January 16, 2012

कत्थक नृत्य : लखनऊ

यूं तो कत्थक नृत्य की शुरुआत जा कर बाबा भोलेनाथ से जुड़ जाती है। लेकिन लखनऊ में इसका नाम हमारे बादशाह वाजिदअली शाह से पहले सुनाई नहीं पड़ता। उनके पहले इस नृत्य की दास्ताँ ब्रजभूमि की रासलीला में खो जाती है। यह ज़रूर है कि वाजिदअली शाह की कोशिशों ने इसे रास लीला से अलग करके एक अद्भुत रूप प्रदान किया जो आज हमारे सामने है। 

लेकिन उनकी कोशिशों में उनके कत्थक नृत्य के उस्ताद ठाकुर प्रसाद का भी बहुत बड़ा योगदान है। ठाकुर प्रसाद का नाम तो यदाकदा इतिहास के पन्नों में दिख भी जाता है। मगर उनके बड़े भाई दुर्गा प्रसाद, जो शायद इस काम में बराबर के हिस्सेदार थे, का नाम तो अब बिलकुल ही भुलाया जा चुका है। ये दोनों ही भाई मुहम्मद अली शाह के जमाने से ही लखनऊ के प्रसिद्ध नृतक रहे थे। 

उनके पिता प्रकाश जी का नाम भी नृत्य के बड़े महिरीन में लिया जाता था। उनके समकालीन नृतकों में हेलाल जी और दयालु जी का नाम आता है, जिन्हों ने नवाब सादतअली ख़ान के ज़माने से लेकर नसीरुद्दीन हैदर तक अपने नृत्य से लखनऊ का नाम रौशन रखा। 

आसफुद्दौला के ज़माने में खुशी महाराज नाम के बड़े उस्ताद मौजूद थे। मैं यह मालूम नहीं कर सका कि जब अवध की गद्दी लखनऊ आई तो खुशी महाराज आसफुद्दौला के साथ आने वालों में से थे, या पहले से यहाँ मौजूद थे, क्योंकि उनका नाम शुजाउद्दौला के समकालीन भी आता है।
Kathak Dancer Wajid Ali Shah

Friday, December 16, 2011

अमीर मिनाई

कहाँ होंगी अमीर ऐसी अदाएं हूर-ओ ग़िल्माँ में
रहेगा खु़ल्द में भी  याद हम को लखनऊ बरसों

ग़िल्माँ : वह लड़के जो जन्नत में आप की खिदमत में मौजूद होंगे. (ताकि कभी तो आप हूरों को बख्श दें)
खु़ल्द : जन्नत

کہاں ہوں گی امیر ایسی ادائیں حوروغلماں میں
رہے گا  خلد میں بھی  یاد ہم کو  لکھنؤ  برسوں

फ़साना-ए आज़ाद

१८७८ में सरशार के लिखे गए फ़साना-ए आज़ाद में उस ज़माने का लखनऊ बिखरा पड़ा है।
एक नज़र डालें तो ज़रा :

मियां आज़ाद निहारमुंह शहर में चक्कर लगा रहे थे तो एक दफा ही क्या देखते हैं कि सामने से एक ज़रनिगार पुरबहार फ़िनस बड़े ठस्से और धूम धड़क्के से आ रही है। कहारों की हरी हरी वर्दी तोतेफड़क, लाल लाल पगिया फ़ौक़ुलभड़क, कंधे जोड़े हुए शहगाम जा रहे हैं। छिटका सुर्ख़ा सुर्ख़ लाल भभूका, फ़िनस ज़रनिगारी सवारी है या बाद-ए बहारी। एक तरहदार बाग़-ओ बहार गुल-ए इज़ार शोख़-ओ अययार महरी साथ है। नज़र इधर उधर मगर फ़िनस के एक कोने पर हाथ है। बेहिजाब बर-अफ़्गंदा नक़ाब, चंदे खुर्शीद चंदे महताब, आँखों में सह्बा-ए जवानी का सुरूर, वह हुस्न वह नूर कि...........

Friday, October 21, 2011

लखनऊ मुझ पर फ़िदा है मैं फ़िदा-ए लखनऊ

आसमां की क्या है ताक़त जो छुडा़ये लखनऊ
लखनऊ मुझ पर फ़िदा है मैं फ़िदा-ए लखनऊ
तू ने देखे हैं कहाँ रंगीं अदा-ए लखनऊ
लाला-ओ गुल के चमन हैं कूचा हाए लखनऊ
पच्छिम और उत्तर के कोने से चली आती है रोज़
बू-ए ज़ुल्फ़-ए यार ले ले कर हवा-ए लखनऊ

آسماں کی کیا ہے طاقت جو چھڑاۓ لکھنؤ
لکھنؤ مجھ پر فدا ہے میں فداۓ لکھنؤ
تونے دیکھے ہیں کہاں رنگیں اداۓ لکھنؤ
لالہ و گل کے چمن ہیں کوچہ ہاۓ لکھنؤ
پچھم اور اتر کے کونے سے چلی آتی ہے روز
بوۓ زلف یار لے لے کر ہواۓ لکھنؤ

Monday, August 22, 2011

मुर्ग़ों की लड़ाई

लखनऊ में मुर्ग़ों की लड़ाई का यह तरीका़ था कि मुर्ग़ के कांटे बाँध दिए जाते ताकि उन को ज़रर न पहुँच सके. चोंच चाक़ू से छील कर तेज़ और नुकीली की जाती और जोड़ के दोनों मुर्ग़ पाली में छोड़ दिए जाते. .... अब दोनों मुर्ग़ चोंचों और लातों से लड़ना शुरू करते. मुर्ग़बाज़ अपने अपने मुर्ग़ को उभारते ... और चिल्ला चिल्ला के कहते- “हाँ बेटा! शाब्बश है!” “हाँ बेटा, काट!” “फिर यहीं पर.”.......
मौलाना अब्दुल हलीम शरर लखनवी


 لکھنؤ میں مرغوں کی لڑائی کا یہ طریقہ تھا کہ مرغ کے کانٹے باندھ دیے جاتے تاکہ ان کو ضرر نہ پہنچ سکے. چونچ چاقو سے چھیل کر تیز اور نوکیلی کی جاتی اور جوڑ کے دونوں مرغ پالی میں چھوڑ دیے جاتے...... اب دونوں مرغ چونچوں اور لاتوں سے لڑنا شروع کرتے. مرغ باز اپنے اپنے مرغ کو ابھرتے... اور چلّا چلّا کے کہتے- ہاں بیٹا! شابش ہے! ہاں بیٹا، کاٹ! پھر یہیں پر....

- مولانا عبدالحلیم شررلکھنوی

Saturday, July 23, 2011

Shahar-e Lucknow


ऐ मेरे लखनऊ क्यों न चाहूँ तुझको
मुझे तूने अपने दिल में जगह दी है

तेरी राहों पे चला हूँ मैं झूले की तरह
तेरी ज़मीन का बिस्तर बिझा कर सोया हूँ
माँ के आँचल सा तेरे गगन को ओढ़ा है
तेरी हवाओं की खुश्बू में कहीं जा खोया हूँ

तेरी फ़िज़ा मुझे जन्नत से सवा लगती है
ऐ मेरे लखनऊ क्यों न चाहूँ तुझको...
                                - शम्स अल फ़ारूक़ी

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اے میرے لکھنؤ کیوں نہ چاہوں تجھ کو
مجھے تونے اپنے دل میں جگہ دی ہے


تیری راہوں پہ چلا ہوں میں جھولے کی طرح
تیری زمین کا بستر بچھا کر سویا ہوں
ماں کے آنچل سا تیرے گگن کو اوڑھا ہے
تیری ہواؤں کی خوشبو میں کہیں جا کھویا ہوں


تیری فضا مجھے جنّت سے سوا لگتی ہے
اے میرے لکھنؤ کیوں نہ چاہوں تجھ کو
                                       - شمس الفاروقی


Saturday, July 2, 2011

लखनवी ज़बान के फ़न

... लखनऊ में इल्म-ए ज़बान के कई फ़न पैदा हो गए, जिन में कोई मुका़म लखनऊ का मुका़बला नहीं कर सकता. इनही में से एक फ़न फब्ती कहना है....... लखनऊ के अदना अदना लड़के, बाजा़री औरतें, जाहिल दूकानदार.... तक ऐसी बरजस्ता फब्तियां कह जाते हैं कि बाहर वालों को हैरत हो जाती है.
- मौलाना अब्दुल हलीम शरर लखनवी

لکھنؤ میں علم زبان کے کئی فن پیدا ہو گئے، جن میں کوئی مقام لکھنؤ کا مقابلہ نہیں کر سکتا. انھی میں سے ایک فن پھبتی کہنا ہے...... لکھنؤ کے ادنا ادنا لڑکے، بازاری عورتیں، جاہل دوکان دار... تک ایسی برجستہ پھبتیاں کہہ جاتے ہیں کہ باہر والوں کو حیرت ہو جاتی ہے.
- مولانا عبدالحلیم شررلکھنوی

Wednesday, May 4, 2011

१८७८ में लिखे गए ‘फ़साना-ए आज़ाद’ का एक हिस्सा | लखनऊ रेलवे स्टेशन


मियाँ आज़ाद और खोजी साहब ने असबाब कसा और स्टेशन पर दाखिल हुए. मियां खोजी को रूपये दिए कि टिकट लाओ. हज़रत जा डटे और जिस वक्त घंटी हुई ठन ठन और काँन्सटिबल ने कहा कि कानपुर के मुसाफिरों चलो! टिकट बट रहा है. खोजी भी लपके और वह रेला आया कि खुदा की पनाह. एक एक पर दस दस गिरे पड़ते हैं.
रतन नाथ सरशार

Friday, April 29, 2011

लखनऊ में खाओ तो पुलाव

देहली में बिरयानी का ज्यादा रिवाज है और था. मगर लखनऊ की नफा़सत ने पुलाओ को उस पर तरजीह दी. अवाम की नज़र में दोनों क़रीब क़रीब बल्कि एक ही हैं. मगर बिरयानी में मसाले की ज्यादती से, सालन मिले हुए चावलों की शान पैदा हो जाती है. और पुलाओ में इतनी लताफ़त, निफा़सत और सफा़ई ज़रूरी समझी जाती है कि बिरयानी उस के सामने मल्गू़बा सी मालूम होती है.

- मौलाना अब्दुल हलीम शरर लखनवी