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Sunday, April 10, 2011

Kaisar Bagh, Lucknow

अजीब बाग़ था रश्क-ए बहिश्त कै़सर बाग़
हर एक दरख़्त था मेवे का गै़रत-ए तूबा
चमन लतीफ़ लतीफ़ आब जू नफ़ीस नफ़ीस

वह ठंडी ठंडी हवा और ऊदी ऊदी घटा
सदा-ए नग़मा से गूंजा हुआ था सारा बाग़

हर एक शाख़ से आती थी बाँसुरी की सदा

सहर लखनवी

Friday, April 8, 2011

कैसर बाग़

कैसर बाग़ १८४८ - १८५० में बना था. नवाब वाजिद अली शाह मेले के दिनों में यहाँ जोगिया कपड़े पहन कर फकीरों की तरह बैठा करते थे....


लुट रही है दौलत-ए दीदार कैसर बाग़ में :  मिसल-ए गुल सब हो गए ज़रदार कैसर बाग़ में,
गाते हैं मुर्गान गुलशन पींग देती है सदा   :   जबकि   झूला   झूलता   है  यार  कैसर बाग़   में.
- फ़लक़