Sunday, July 29, 2012

आबदारख़ाना-ए लखनऊ


आबदारख़ाना – नाम सुना है कभी??? मुश्किल से ही कोई हाँ कहेगा। आज तो हमें बावर्चीख़ाना तक सुनाई नहीं पड़ता जो कि घर घर की बात है। हर जगह किचन हो गया है। तो आबदारख़ाना क्या सुनाई पड़ेगा जो नवाबों और अमीरों की बात थी।

आबदारख़ाना, यानि कि पीने के पानी का इंतेज़ाम या उसको रखने की जगह। बाक़ाएदा इसके दारोग़ा होते थे, यानि कि इनचार्ज और उनके नीचे मुलाज़िमों की फौज। पानी कोरे घड़ों में भर कर रखा जाता। पीने के लिये ख़ूबसूरत आबख़ोरे (अरे कुल्हड़ मत कहिये जनाब। आबख़ोरा में जो नवाबी झलकती है वह लफ़्ज़ कुल्हड़ में कहाँ) रखे जाते। घड़ों पर लाल रंग का कपड़ा चढ़ा दिया जाता था और उसे हमेशा पानी से तर रखा जाता था। हवा जितनी गरम होती थी, घड़े का पानी उतना ही ठंडा होता था। यह तरीक़ा हम अब भी प्याऊ पर देखते हैं।

सुराहियाँ लखनऊ की मिट्टी से हमेशा बेहतरीन बनी हैं, या झज्झर, जिनके मुंह पर कपड़ा बांध कर पेड़ों की डालियों पर उल्टा लटका देते थे। बरसात के मौसम में यह सब काम न आता, तो घड़ों को रस्सी से बांध कर कुएं के पानी में डुबा कर रखते थे। वक़्त के साथ नवाबी ख़त्म हो गई, नवाब नहीं रहे। आबदारख़ाने भी नहीं रहे।


آب دار خانۂ لکھنؤ

آب دار خانہ - نام سنا ہے کبھی؟؟؟ مشکل سے ہی کوئی ہاں کہے گا. آج تو ہمیں باورچي خانہ تک سنائی نہیں پڑتا جو کہ گھر گھر کی بات ہے. ہر جگہ کِچن ہو گیا ہے. آب دار خانہ کیا سنائی پڑے گا جو نوابوں اور امیروں کی بات تھی.

آب دار خانہ، یعنی کہ پینے کے پانی کا انتظام یا اس کو رکھنے کی جگہ. باقائدہ اس داروغہ ہوتے تھے، یعنی کہ اِنچارج اور ان کے نیچے ملازموں کی فوج. پانی كورے گھڑوں میں بھر کر رکھا جاتا. پینے کے لیے خوبصورت آب خورے (ارے کلہڑ مت کہیے جناب. آب خورہ میں جو نوابی جھلکتی ہے وہ لفظ کلہڑ میں کہاں) رکھے جاتے. گھڑوں پر سرخ رنگ کا کپڑا چڑھا دیا جاتا تھا اور اسے ہمیشہ پانی سے تر رکھا جاتا تھا. ہوا جتنی گرم ہوتی تھی، گھڑے کا پانی اتنا ہی ٹھنڈا ہوتا تھا. یہ طریقہ ہم اب بھی پياؤ ​​پر دیکھتے ہیں.

سراهياں لکھنؤ کی مٹی سے ہمیشہ ہی بہترین بنی ہیں، یا جھجھر، جن کے منہ پر کپڑا باندھ کر درختوں کی شاخوں پر الٹا لٹکا دیتے تھے. بارش کے موسم میں یہ سب کام نہ آتا، تو گھڑوں کو رسی سے باندھ کر کنویں کے پانی میں ڈبو کر رکھتے تھے. وقت کے ساتھ نوابی ختم ہو گئی. نواب نہیں رہے. آب دار خانے بھی نہیں رہے.


Wednesday, June 13, 2012

आम क्या हैं ख़ुदा की कुदरत हैं; जिन से हिंदोस्तान जन्नत है

दुनिया में कहीं भी अगर आम का नाम लिया जाता है तो भारत का नाम उसके साथ जुड़ ही जाता है। आम का नाम भारत में बहुत ही आम है। और ऐसे ही आम हैं यहाँ आम को चाहने वाले –
हिन्द के सब मेवों का सरदार है | रौनक़ हर कूचा ओ बाज़ार है (इसमाईल मेरठी)

आम को चाहने वाले भारत के हर कोने में मौजूद हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब का आम खाने का क़िस्सा तो दुनिया जानती है। ऐसे ही यहाँ लखनऊ में भी थे कोई अब्दुल बाक़ी साहब। आम ऐसे पसंद आये कि पूरी मसनवी (बहुत लंबी कविता) लिख मारी। कुल बीस पेज की यह मसनवी ‘अम्बा नामा’ 1922 में लखनऊ से छप भी चुकी है। ज़ाएक़े के लिये कुछ शेर देखिये –

मग़्ज़ बादाम से है बेहतर आम | जिस का बे दाम बंदा है बादाम।
तुख़्म शीर ओ शकर में पलता है | बन के तब शहद फल निकलता है।
जब कि ये झूलते हैं शाख़ों पर | हूरें गाती हैं अपने काख़ों पर।
अब्र मस्ताना वार झूमता है | शौक़ से मुंह को उनके चूमता है।
...    ...
आम क्या हैं ख़ुदा की कुदरत हैं | जिन से हिंदोस्तान जन्नत है॥
{मग़्ज़: गूदा; तुख़्म: बीज; काख़: बारामदा या गैलरी; अब्र: बादल}
Lucknow : the City of Mangoes

Saturday, May 26, 2012

मिटे नामियों के निशां कैसे कैसे – ख़्वाजा आतिश

आज लखनऊ में मैं नौजवानों की किसी महफ़िल में अगर आतिश का नाम लूं तो शायद बहुत कम ही लोग इसे समझ पाएंगे। मगर पूरी दुनिया में कहीं भी उर्दू (या हिन्दी भी) जानने वालों की महफ़िल में मैं उनका एक शेर पढ़ दूं तो शायद हर एक ने सुना होगा –
ज़मीन-ए चमन गुल खिलाती है क्या क्या : बदलता है रंग आसमां कैसे कैसे ॥

ख़्वाजा हैदर अली आतिश थे तो दिल्ली के किसी सूफ़ी ख़ानदान के, मगर उनके वालिद ख़्वाजा अली बख़्श फैज़ाबाद आकार बस गए थे। वहीं 1778 में आतिश का जन्म हुआ। कमउमरी में ही बाप का साया सर से उठ गया। सो पढ़ाई ठीक से न हो सकी। मगर तलवारबाज़ी में कोई जवाब न था। बड़े होकर नवाब मिर्ज़ा मुहम्मद तक़ी के तलवारबाज़ों में शामिल हो गये। फिर उन्हीं के साथ लखनऊ चले आये।

लखनऊ की तो फ़िज़ा में ही शाएरी थी, और मिज़ाज ख़ानदानी सूफ़ियाना। मूसहफ़ी जैसे उस्ताद का साथ मिल गया तो शायरी ऐसी परवान चढ़ी कि सर चढ़ कर बोलने लगी। नवाब मुहम्मद तक़ी की मौत के बाद किसी और से जुड़ने से इंकार कर दिया। पूरी तरह दरवेशी इख़्तियार कर ली। लिबास गेरुए रंग का चोग़ा। हाथ में मोटा डांडा। मगर कमर से तलवार न छूटी। बाद में भांग भी पीनी शुरू कर दी और पूरी तरह अपनी ही दुनिया में रंग गये।
 
शाह-ए लखनऊ से अस्सी रुपये महीने के मिलते थे। उसी में गुज़र होती थी। नावाज़गंज के क़रीब माधोलाल की चढ़ाई के पास एक छोटा सा बाग़ीचा जिसमें एक कच्चा मकान भी था, ख़रीद लिया था। शादी भी की और एक बेटा भी हुआ। आख़िर उम्र में आँखों की बीनाई जाती रही थी। 1847 में इन्तेक़ाल के वक़्त काफ़ी बीमार और कमज़ोर हो गये थे। उनके घर में ही उनको दफन किया गया।
Khwaja Haidar Ali Atish
आये भी लोग बैठे भी उठ भी खड़े हुये
मैं जा ही ढूंढता तेरी महफ़िल में रह गया

Tuesday, May 15, 2012

लखनऊ में खाईये तो बालाई...

लखनऊ वालों को बालाई का शौक़ शुरू से ही रहा है. बालाई की तहों को इतनी खूबसूरती से जमाना शायद ही किसी और शहर के लोगों को आता हो. दरअसल इसको पुराने ज़माने से मलाई ही कहा जाता रहा है. नवाब आसिफुद्दौला बहादुर को यह इस क़दर पसंद थी कि वह इसको ख़ास तरीकों से तैयार करवाया करते थे. उन्हों ने इसका नाम मलाई से बालाई कर दिया क्योंकि यह दूध के ऊपर तैरती है = बाला + मलाई. फिर तो यह लफ्ज़ इस क़दर ज़बान चढ़ा कि हर शहर में फैल गया और बालाई बोलना शरीफ़ाना ज़बान का हिस्सा बन गया. तो अगली बार अगर आप लखनऊ में हैं, और अपने आप को शरीफ़ समझते हैं, और बालाई की जगह मलाई पर हाथ साफ़ कर रहे हैं..... तो या तो मलाई को दुरुस्त कर लीजिएगा, या शरीफ़ को.

Thursday, April 19, 2012

जिसको दे न मौला.......

कहते हैं पुराने लखनऊ में कुछ दूकानदार अब भी आसफ़-उद-दौला का नाम लेकर दूकानें खोलते हैं. आसफ़-उद-दौला 23 सितम्बर, 1748 को पैदा हुए, 26 जनवरी, 1775 को उन्हें अवध के नवाब वज़ीर के ओहदे से नवाज़ा गया, और 28 जनवरी 1775 को अपने पिता शुजा-उद-दौला की मृत्यु के बाद 26 साल की उम्र में नवाब बने. आज जिस लखनऊ पर आप फख़्र करते हैं, यह लखनऊ लखनऊ होता ही नहीं अगर आसफ़-उद-दौला 1775 में अवध की राजधानी को फैजाबाद से लखनऊ न ले आते. 21 सितम्बर 1797 को उन्होंने हमेशा के लिये ख़ामोशी इख़्तियार कर ली और इमामबाड़ा आसफ़ी में आरामफ़र्मा हैं.

1783 के एक दशक तक चले अकाल के वक़्त जिसमें सब कुछ बर्बाद हो चुका था, आसफ़-उद-दौला ने आसफ़ी (बड़ा) इमामबाड़ा बनवाना (1784) शुरू ही इस लिये किया था कि लोगों को हक़ का रोज़गार मिल जाये और वह सिर्फ उनके रहम पर न रहें. कहा जाता है दिन भर दीवारें खड़ी होती थीं और रात में गिरा दी जाती थीं. और इमारत सालों साल तक तक पूरी न हुई जब तक अकाल चलता रहा.

सदियों से यह सदा लखनऊ की गलियों में गूंजती आ रही है, और ताक़यामत गूंजती रहेगी –

जिसको दे न मौला, उसके दे आसफ़-उद-दौला.’

Nawab Asaf ud Daula