Saturday, July 23, 2011

Shahar-e Lucknow


ऐ मेरे लखनऊ क्यों न चाहूँ तुझको
मुझे तूने अपने दिल में जगह दी है

तेरी राहों पे चला हूँ मैं झूले की तरह
तेरी ज़मीन का बिस्तर बिझा कर सोया हूँ
माँ के आँचल सा तेरे गगन को ओढ़ा है
तेरी हवाओं की खुश्बू में कहीं जा खोया हूँ

तेरी फ़िज़ा मुझे जन्नत से सवा लगती है
ऐ मेरे लखनऊ क्यों न चाहूँ तुझको...
                                - शम्स अल फ़ारूक़ी

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اے میرے لکھنؤ کیوں نہ چاہوں تجھ کو
مجھے تونے اپنے دل میں جگہ دی ہے


تیری راہوں پہ چلا ہوں میں جھولے کی طرح
تیری زمین کا بستر بچھا کر سویا ہوں
ماں کے آنچل سا تیرے گگن کو اوڑھا ہے
تیری ہواؤں کی خوشبو میں کہیں جا کھویا ہوں


تیری فضا مجھے جنّت سے سوا لگتی ہے
اے میرے لکھنؤ کیوں نہ چاہوں تجھ کو
                                       - شمس الفاروقی


Saturday, July 2, 2011

लखनवी ज़बान के फ़न

... लखनऊ में इल्म-ए ज़बान के कई फ़न पैदा हो गए, जिन में कोई मुका़म लखनऊ का मुका़बला नहीं कर सकता. इनही में से एक फ़न फब्ती कहना है....... लखनऊ के अदना अदना लड़के, बाजा़री औरतें, जाहिल दूकानदार.... तक ऐसी बरजस्ता फब्तियां कह जाते हैं कि बाहर वालों को हैरत हो जाती है.
- मौलाना अब्दुल हलीम शरर लखनवी

لکھنؤ میں علم زبان کے کئی فن پیدا ہو گئے، جن میں کوئی مقام لکھنؤ کا مقابلہ نہیں کر سکتا. انھی میں سے ایک فن پھبتی کہنا ہے...... لکھنؤ کے ادنا ادنا لڑکے، بازاری عورتیں، جاہل دوکان دار... تک ایسی برجستہ پھبتیاں کہہ جاتے ہیں کہ باہر والوں کو حیرت ہو جاتی ہے.
- مولانا عبدالحلیم شررلکھنوی

Wednesday, May 4, 2011

१८७८ में लिखे गए ‘फ़साना-ए आज़ाद’ का एक हिस्सा | लखनऊ रेलवे स्टेशन


मियाँ आज़ाद और खोजी साहब ने असबाब कसा और स्टेशन पर दाखिल हुए. मियां खोजी को रूपये दिए कि टिकट लाओ. हज़रत जा डटे और जिस वक्त घंटी हुई ठन ठन और काँन्सटिबल ने कहा कि कानपुर के मुसाफिरों चलो! टिकट बट रहा है. खोजी भी लपके और वह रेला आया कि खुदा की पनाह. एक एक पर दस दस गिरे पड़ते हैं.
रतन नाथ सरशार

Friday, April 29, 2011

लखनऊ में खाओ तो पुलाव

देहली में बिरयानी का ज्यादा रिवाज है और था. मगर लखनऊ की नफा़सत ने पुलाओ को उस पर तरजीह दी. अवाम की नज़र में दोनों क़रीब क़रीब बल्कि एक ही हैं. मगर बिरयानी में मसाले की ज्यादती से, सालन मिले हुए चावलों की शान पैदा हो जाती है. और पुलाओ में इतनी लताफ़त, निफा़सत और सफा़ई ज़रूरी समझी जाती है कि बिरयानी उस के सामने मल्गू़बा सी मालूम होती है.

- मौलाना अब्दुल हलीम शरर लखनवी

Friday, April 22, 2011

सहर लखनवी : سحر لکھنوی


इसी शहर का नाम है लखनऊ : इसी शहर की सहर है गुफ्तगू
अजब शहर है कुछ अजब लोग हैं : बहुत हैं मगर मुन्तख़ब लोग हैं

اسی شہر کا نام ہے لکھنؤ : اسی شہر کی سحر ہے گفتگو
عجب شہر ہے کچھ عجب لوگ ہیں : بہت ہیں مگر منتخب لوگ ہیں