लखनऊ वालों को बालाई का शौक़ शुरू से ही रहा है. बालाई की तहों को इतनी खूबसूरती से जमाना शायद ही किसी और शहर के लोगों को आता हो. दरअसल इसको पुराने ज़माने से मलाई ही कहा जाता रहा है. नवाब आसिफुद्दौला बहादुर को यह इस क़दर पसंद थी कि वह इसको ख़ास तरीकों से तैयार करवाया करते थे. उन्हों ने इसका नाम मलाई से बालाई कर दिया क्योंकि यह दूध के ऊपर तैरती है = बाला + मलाई. फिर तो यह लफ्ज़ इस क़दर ज़बान चढ़ा कि हर शहर में फैल गया और बालाई बोलना शरीफ़ाना ज़बान का हिस्सा बन गया. तो अगली बार अगर आप लखनऊ में हैं, और अपने आप को शरीफ़ समझते हैं, और बालाई की जगह मलाई पर हाथ साफ़ कर रहे हैं..... तो या तो मलाई को दुरुस्त कर लीजिएगा, या शरीफ़ को.
Tuesday, May 15, 2012
Thursday, April 19, 2012
जिसको दे न मौला.......
कहते हैं पुराने लखनऊ में कुछ दूकानदार अब भी आसफ़-उद-दौला का नाम लेकर दूकानें खोलते हैं. आसफ़-उद-दौला 23 सितम्बर, 1748 को पैदा हुए, 26 जनवरी, 1775 को उन्हें अवध के नवाब वज़ीर के ओहदे से नवाज़ा गया, और 28 जनवरी 1775 को अपने पिता शुजा-उद-दौला की मृत्यु के बाद 26 साल की उम्र में नवाब बने. आज जिस लखनऊ पर आप फख़्र करते हैं, यह लखनऊ लखनऊ होता ही नहीं अगर आसफ़-उद-दौला 1775 में अवध की राजधानी को फैजाबाद से लखनऊ न ले आते. 21 सितम्बर 1797 को उन्होंने हमेशा के लिये ख़ामोशी इख़्तियार कर ली और इमामबाड़ा आसफ़ी में आरामफ़र्मा हैं.
1783 के एक दशक तक चले अकाल के वक़्त जिसमें सब कुछ बर्बाद हो चुका था, आसफ़-उद-दौला ने आसफ़ी (बड़ा) इमामबाड़ा बनवाना (1784) शुरू ही इस लिये किया था कि लोगों को हक़ का रोज़गार मिल जाये और वह सिर्फ उनके रहम पर न रहें. कहा जाता है दिन भर दीवारें खड़ी होती थीं और रात में गिरा दी जाती थीं. और इमारत सालों साल तक तक पूरी न हुई जब तक अकाल चलता रहा.
सदियों से यह सदा लखनऊ की गलियों में गूंजती आ रही है, और ताक़यामत गूंजती रहेगी –
1783 के एक दशक तक चले अकाल के वक़्त जिसमें सब कुछ बर्बाद हो चुका था, आसफ़-उद-दौला ने आसफ़ी (बड़ा) इमामबाड़ा बनवाना (1784) शुरू ही इस लिये किया था कि लोगों को हक़ का रोज़गार मिल जाये और वह सिर्फ उनके रहम पर न रहें. कहा जाता है दिन भर दीवारें खड़ी होती थीं और रात में गिरा दी जाती थीं. और इमारत सालों साल तक तक पूरी न हुई जब तक अकाल चलता रहा.
सदियों से यह सदा लखनऊ की गलियों में गूंजती आ रही है, और ताक़यामत गूंजती रहेगी –
‘जिसको दे न मौला, उसके दे आसफ़-उद-दौला.’
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| Nawab Asaf ud Daula |
Monday, March 12, 2012
शीरमाल-ए अवध
मुसलमान जब भारत आये तो अपने साथ ख़मीरी और तंदूरी रोटियाँ लाये। ये सादी रोटियाँ थीं, इन पर घी तक न लगता था। भारत आकर उन्होंने जिन अजीब चीज़ों को पहली बार देखा, उनमें पूरियाँ भी थीं। पहले तो उन्होंने अपनी रोटियों पर घी चपोड़ा, फिर उनमें परतें और तहें जमानी शुरू करदीं। इस तरह पराठे बने। शाही दस्तरख़ान तक पहुँचते पहुँचते ये पराठे बाकरख़ानी बन गये।
हमारे नवाब, बादशाह-ए अवध नसीरुद्दीन हैदर के ज़माने में मुहम्दू नाम के एक शख़्स, जो यहाँ का तो नहीं था कहीं बाहर से आया था, ने फिरंगी महल में एक खाने का होटल खोला। जल्द ही उसकी नहारी की शोहरत दूर दूर तक फैल गई। यहाँ तक कि लखनऊ के बड़े बड़े रईस और शहज़ादे भी उसके ज़ाएक़े की क़दर करने लगे। मुहम्दू ने नहारी के साथ खाने के लिए रोटियों के साथ भी तजुर्बे किये। उन तजुर्बों का बेहतरीन नतीजा शीरमाल की शक्ल में सामने आया।
हमारे नवाब, बादशाह-ए अवध नसीरुद्दीन हैदर के ज़माने में मुहम्दू नाम के एक शख़्स, जो यहाँ का तो नहीं था कहीं बाहर से आया था, ने फिरंगी महल में एक खाने का होटल खोला। जल्द ही उसकी नहारी की शोहरत दूर दूर तक फैल गई। यहाँ तक कि लखनऊ के बड़े बड़े रईस और शहज़ादे भी उसके ज़ाएक़े की क़दर करने लगे। मुहम्दू ने नहारी के साथ खाने के लिए रोटियों के साथ भी तजुर्बे किये। उन तजुर्बों का बेहतरीन नतीजा शीरमाल की शक्ल में सामने आया।
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| Sheermal - e Awadh |
आज कोई 180 साल बाद भी शीरमाल अवध से बाहर कहीं नहीं बनती। अगर बनती भी है हम से बेहतर नहीं। अब वक़्त है, कि अब तक नहीं, तो अब हमें शीरमाल को अवध की क़ौमी रोटी डिक्लेयर कर देनी चाहिये।
Monday, January 16, 2012
कत्थक नृत्य : लखनऊ
यूं तो कत्थक नृत्य की शुरुआत जा कर बाबा भोलेनाथ से
जुड़ जाती है। लेकिन लखनऊ में इसका नाम हमारे बादशाह वाजिदअली शाह से पहले सुनाई
नहीं पड़ता। उनके पहले इस नृत्य की दास्ताँ ब्रजभूमि की रासलीला में खो जाती है। यह
ज़रूर है कि वाजिदअली शाह की कोशिशों ने इसे रास लीला से अलग करके एक
अद्भुत रूप प्रदान किया जो आज हमारे सामने है।
लेकिन उनकी कोशिशों में उनके कत्थक नृत्य के उस्ताद ठाकुर प्रसाद का भी बहुत बड़ा योगदान है। ठाकुर प्रसाद का नाम तो यदाकदा इतिहास के पन्नों में दिख भी जाता है। मगर उनके बड़े भाई दुर्गा प्रसाद, जो शायद इस काम में बराबर के हिस्सेदार थे, का नाम तो अब बिलकुल ही भुलाया जा चुका है। ये दोनों ही भाई मुहम्मद अली शाह के जमाने से ही लखनऊ के प्रसिद्ध नृतक रहे थे।
उनके पिता प्रकाश जी का नाम भी नृत्य के बड़े महिरीन में लिया जाता था। उनके समकालीन नृतकों में हेलाल जी और दयालु जी का नाम आता है, जिन्हों ने नवाब सादतअली ख़ान के ज़माने से लेकर नसीरुद्दीन हैदर तक अपने नृत्य से लखनऊ का नाम रौशन रखा।
आसफुद्दौला के ज़माने में खुशी महाराज नाम के बड़े उस्ताद मौजूद थे। मैं यह मालूम नहीं कर सका कि जब अवध की गद्दी लखनऊ आई तो खुशी महाराज आसफुद्दौला के साथ आने वालों में से थे, या पहले से यहाँ मौजूद थे, क्योंकि उनका नाम शुजाउद्दौला के समकालीन भी आता है।
लेकिन उनकी कोशिशों में उनके कत्थक नृत्य के उस्ताद ठाकुर प्रसाद का भी बहुत बड़ा योगदान है। ठाकुर प्रसाद का नाम तो यदाकदा इतिहास के पन्नों में दिख भी जाता है। मगर उनके बड़े भाई दुर्गा प्रसाद, जो शायद इस काम में बराबर के हिस्सेदार थे, का नाम तो अब बिलकुल ही भुलाया जा चुका है। ये दोनों ही भाई मुहम्मद अली शाह के जमाने से ही लखनऊ के प्रसिद्ध नृतक रहे थे।
उनके पिता प्रकाश जी का नाम भी नृत्य के बड़े महिरीन में लिया जाता था। उनके समकालीन नृतकों में हेलाल जी और दयालु जी का नाम आता है, जिन्हों ने नवाब सादतअली ख़ान के ज़माने से लेकर नसीरुद्दीन हैदर तक अपने नृत्य से लखनऊ का नाम रौशन रखा।
आसफुद्दौला के ज़माने में खुशी महाराज नाम के बड़े उस्ताद मौजूद थे। मैं यह मालूम नहीं कर सका कि जब अवध की गद्दी लखनऊ आई तो खुशी महाराज आसफुद्दौला के साथ आने वालों में से थे, या पहले से यहाँ मौजूद थे, क्योंकि उनका नाम शुजाउद्दौला के समकालीन भी आता है।
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| Kathak Dancer Wajid Ali Shah |
Friday, December 16, 2011
अमीर मिनाई
कहाँ होंगी अमीर ऐसी अदाएं हूर-ओ ग़िल्माँ में
रहेगा खु़ल्द में भी याद हम को लखनऊ बरसों
ग़िल्माँ : वह लड़के जो जन्नत में आप की खिदमत में मौजूद होंगे. (ताकि कभी तो आप हूरों को बख्श दें)
खु़ल्द : जन्नत
खु़ल्द : जन्नत
کہاں ہوں گی امیر ایسی ادائیں حوروغلماں میں
رہے گا خلد میں بھی یاد ہم کو لکھنؤ برسوں
رہے گا خلد میں بھی یاد ہم کو لکھنؤ برسوں
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